August 18, 2026
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अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) पटना ने पहली बार लिविंग डोनर लिवर ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक कर बिहार में अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है।
पटना के 54 वर्षीय व्यक्ति ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस के कारण लिवर की अंतिम अवस्था की बीमारी से जूझ रहे थे। उनके लिए लिवर ट्रांसप्लांट ही जीवन बचाने का प्रमुख विकल्प रह गया था। ऐसे में उनकी पत्नी ने अपने स्वस्थ लिवर का एक हिस्सा दान किया। मरीज और डोनर की विस्तृत जांच के बाद दोनों का सफलतापूर्वक प्रत्यारोपण किया गया। एम्स पटना सितंबर 2025 में कैडेवरिक (मृत डोनर) से लिवर ट्रांसप्लांट भी सफलतापूर्वक कर चुका है। दोनों उपलब्धियों के बाद संस्थान बिहार और आसपास के राज्यों के मरीजों को अत्याधुनिक लिवर ट्रांसप्लांट सुविधा उपलब्ध कराने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
संवाददाता सम्मेलन में यह जानकारी एम्स पटना के निदेशक प्रो. (ब्रिगेडियर) डॉ. राजू अग्रवाल ने दी। उन्होंने बताया कि लिवर ट्रांसप्लांट कार्यक्रम का नेतृत्व सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो. उत्पल आनंद ने किया।
इस प्रत्यारोपण में करीब 14 से 16 घंटे लगे और लगभग 15 लाख रुपये खर्च हुए। इसमें करीब 90 प्रतिशत आर्थिक सहायता एम्स प्रशासन की ओर से दी गई। ट्रांसप्लांट टीम में डॉ. कुणाल पारस, डॉ. बसंत नारायण सिंह और डॉ. किसलय कांत शामिल रहे। एनेस्थीसियोलॉजी विभाग से प्रो. उमेश कुमार भदानी, डॉ. कुणाल सिंह और डॉ. रजनीश कुमार, इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी से प्रो. राजीव नयन प्रियदर्शी तथा गैस्ट्रोएंटरोलॉजी से प्रो. रमेश कुमार ने सहयोग किया। डॉ. उत्पल आनंद ने बताया कि लिविंग डोनर लिवर ट्रांसप्लांट में एक स्वस्थ व्यक्ति के लिवर का एक हिस्सा निकालकर मरीज में प्रत्यारोपित किया जाता है।
इस प्रक्रिया में डोनर और मरीज, दोनों की बड़ी सर्जरी होती है। लिवर की रक्त वाहिकाओं और पित्त नलिकाओं को बेहद सावधानी से जोड़ा जाता है। इसके बाद डोनर और मरीज दोनों को विशेषज्ञों की निगरानी में रखा जाता है। उन्होंने बताया कि इस ट्रांसप्लांट में 14 से 16 घंटे लगे। प्रत्यारोपण के बाद डोनर के शरीर में बचा लिवर और मरीज में प्रत्यारोपित किया गया लिवर का हिस्सा समय के साथ बढ़ता है और अपनी कार्यक्षमता विकसित करता है। इस मरीज को ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस था। इसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से लिवर की कोशिकाओं पर हमला करने लगती है।
लंबे समय तक बीमारी नियंत्रित नहीं होने पर लिवर में सूजन, फाइब्रोसिस और सिरोसिस विकसित हो सकता है। गंभीर स्थिति में लिवर फेलियर तक हो सकता है और ट्रांसप्लांट की आवश्यकता पड़ सकती है।
एम्स पटना की इस उपलब्धि से गंभीर लिवर रोगियों को ट्रांसप्लांट के लिए दूसरे राज्यों के बड़े शहरों का रुख करने की जरूरत कम होगी।
संस्थान का लक्ष्य बिहार और पड़ोसी राज्यों के मरीजों को उच्च गुणवत्ता वाली, आधुनिक, किफायती और मरीज-केंद्रित लिवर ट्रांसप्लांट सेवा उनके घर के करीब उपलब्ध कराना है।

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