सम के एक प्रमुख क्षेत्रीय दल ने निर्वाचन क्षेत्रों के नए परिसीमन को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है और चेतावनी दी है कि इससे उत्तर-पूर्व भारत की राजनीतिक शक्ति कम हो सकती है। पार्टी का तर्क है कि यदि २०२६ के बाद जनसंख्या के आधार पर सीटों का निर्धारण किया गया, तो दक्षिण और उत्तर-पूर्व के राज्यों को नुकसान होगा, क्योंकि इन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है। पार्टी के नेताओं के अनुसार, उत्तर-पूर्व के ८ राज्यों की वर्तमान २५ लोकसभा सीटों की संख्या और प्रभाव भविष्य में घटने की आशंका है, जिससे केंद्र सरकार में इस क्षेत्र की सामूहिक आवाज़ कमजोर पड़ सकती है।
पार्टी ने इस बात पर जोर दिया है कि परिसीमन की प्रक्रिया केवल जनसंख्या तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसमें भौगोलिक दुर्गमता और भाषाई विविधता जैसे कारकों को भी महत्व दिया जाना चाहिए। रिपोर्ट के अनुसार, यदि उत्तर भारत के राज्यों में सीटों की संख्या तेजी से बढ़ती है, तो संसद में उत्तर-पूर्व की हिस्सेदारी १० प्रतिशत से भी कम रह जाएगी। क्षेत्रीय दल ने केंद्र सरकार से मांग की है कि छोटे राज्यों के हितों की रक्षा के लिए एक विशेष सुरक्षा तंत्र बनाया जाए ताकि विकास के मानकों को पूरा करने वाले राज्यों को राजनीतिक रूप से दंडित न किया जाए।
