बॉम्बे हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार के उस बड़े फैसले को पूरी तरह रद्द कर दिया है जिसके तहत भारती एयरटेल और वोडाफोन आइडिया पर पिछली तारीख (रेट्रोस्पेक्टिव) से ‘वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज’ (ओटीसी) थोपा गया था। अदालत ने यह महत्वपूर्ण फैसला दूरसंचार ऑपरेटरों द्वारा दायर याचिकाओं को स्वीकार करते हुए सुनाया, जिसमें सरकार द्वारा एक जुलाई दो हजार आठ से इकतीस दिसंबर दो हजार बारह के बीच छह दशमलव दो मेगाहर्ट्ज से अधिक स्पेक्ट्रम रखने पर बाजार-लिंक्ड कीमतों के आधार पर अतिरिक्त शुल्क की मांग की गई थी। माननीय उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि केंद्रीय टेलीग्राफ अधिनियम की धारा चार सरकार को लाइसेंस जारी करते समय वित्तीय शर्तें तय करने की अनुमति जरूर देती है, लेकिन यह प्रावधान सरकार को वर्षों बाद वित्तीय शर्तों में एकतरफा बदलाव करने या पिछली तारीख से नए वित्तीय बोझ डालने का कोई कानूनी अधिकार नहीं देता है।
अदालत ने केंद्रीय कैबिनेट द्वारा आठ नवंबर और अट्ठाईस दिसंबर दो हजार बारह को लिए गए नीतिगत फैसलों के साथ-साथ दूरसंचार विभाग (डॉट) द्वारा कंपनियों को जारी किए गए सभी मांग नोटिसों को अवैध ठहराते हुए खारिज कर दिया है। इसके साथ ही, पीठ ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि इन विवादित मांगों के तहत टेलीकॉम कंपनियों द्वारा जमा की गई सभी बैंक गारंटियां तुरंत वापस की जाएं और इस संबंध में उठाए गए सभी प्रशासनिक कदमों को वापस लिया जाए। कोर्ट ने अपने फैसले में इस बात पर विशेष जोर दिया कि सरकार केवल ‘जनहित’ का व्यापक हवाला देकर स्थापित अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) की शर्तों से पीछे नहीं हट सकती है, खासकर तब जब राष्ट्रीय दूरसंचार नीति-उन्नीस सौ निन्यानवे का मुख्य उद्देश्य केवल राजस्व एकत्र करना नहीं बल्कि कुशल स्पेक्ट्रम उपयोग और ग्रामीण क्षेत्रों में सस्ती दूरसंचार सेवाएं प्रदान करना था।
