October 2, 2026
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यह बात अटपटी लग सकती है कि शरीर की कोशिकाएं जो अपना कचरा खुद साफ करती हैं, उनकी इस प्रक्रिया को बाहर से भी नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन हाल ही में हुआ एक साझा शोध इसी सच को सामने लाता है। इस महत्वपूर्ण रिसर्च को नई दिल्ली स्थित सीएसआइआर-आइजीआइबी, सोनीपत के नेशनल इंस्टीट्यूट आफ इम्यूनोलॉजी, अशोका यूनिवर्सिटी और अमेरिका की यूनिवर्सिटी आफ कैलिफोर्निया लॉस एंजिलिस के शोधकर्ताओं ने मिलकर अंजाम दिया है। उनका कहना है कि जब शरीर में सेल अपनी कचरा सफाई की प्रक्रिया शुरू करती है, तो इसे बाहर से मैनेज किया जा सकता है, जिससे कैंसर या पार्किंसंस जैसी बीमारियों में सेल की सफाई प्रक्रिया को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी क्योंकि ऐसी बीमारियों में यह सिस्टम ठीक से काम नहीं करता। आपको बता दें कि इस रीसाइक्लिंग प्रोसेस को ‘ऑटोफैगी’ कहते हैं, जिसमें सेल ‘ऑटोफैगोसोम’ नाम की रीसाइक्लिंग बिन जैसी कैविटी बनाकर मलबे को घेरकर तोड़ती है और ऊर्जा या नई ग्रोथ के लिए उसके हिस्सों का इस्तेमाल करती है। इसके अलावा, इंटरमिटेंट फास्टिंग यानी बीच-बीच में उपवास करना भी ऑटोफैगी को शुरू करने में बेहद मददगार है, क्योंकि इससे लंबे समय तक भूखे रहने पर ग्लूकोज और अमीनो एसिड का स्तर कम होने पर शरीर को ऊर्जा बचाने का संकेत मिलता है। ग्रीक भाषा में ‘फैगी’ का अर्थ ‘खुद को खाना’ होता है, और शोधकर्ताओं ने सिमुलेशन के माध्यम से ऑटोफैगी के प्रोटीन “एलसी3” के व्यवहार का अध्ययन करके यह पाया कि यह सेल की रीसाइक्लिंग बिन की अंदरूनी सतह को छूते ही अपना आकार बदल लेता है।

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