चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी और जीविका द्वारा १० लाख से अधिक लोगों पर किए गए एक व्यापक राज्यव्यापी सर्वेक्षण के अनुसार, बिहार में २०१६ से लागू शराबबंदी नीति ने महिलाओं के जीवन स्तर में सुधार किया है। सर्वेक्षण में शामिल ९९% महिलाओं ने इस नीति का समर्थन किया है। रिपोर्ट के अनुसार, लगभग ८७% परिवारों की घरेलू आय में वृद्धि हुई है, जबकि ७२% लोगों ने कहा कि शराब पर खर्च होने वाला पैसा अब बच्चों की शिक्षा पर लगाया जा रहा है। इसके अलावा, ५४% उत्तरदाताओं ने पौष्टिक भोजन पर अधिक खर्च करने और ७४% ने परिवार के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताने की बात कही है। लगभग ४०% महिलाओं ने महसूस किया कि अब वे काम या अन्य गतिविधियों के लिए घर से बाहर निकलने में अधिक स्वतंत्र और सम्मानित महसूस करती हैं।
हालांकि, विशेषज्ञों और विश्लेषकों का मत इस पर मिला-जुला है। सामाजिक विश्लेषक एन.के. चौधरी का मानना है कि शराबबंदी के सामाजिक लाभ राजस्व के नुकसान से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू हिंसा और सड़कों पर होने वाली अशांति में कमी आई है। दूसरी ओर, कुछ अध्ययनों और आलोचकों ने शराब की अवैध तस्करी और होम डिलीवरी जैसे काले बाजार की मौजूदगी पर चिंता जताई है। पटना यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन के अनुसार, शहर के ५८% लोगों की शराब तक अब भी पहुंच है, भले ही वह दोगुनी कीमत पर उपलब्ध हो। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि महिलाओं के सशक्तिकरण को केवल शराबबंदी से जोड़ना सही नहीं होगा, क्योंकि साइकिल योजना और जीविका समूह जैसे कार्यक्रमों ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई है।
