सतत निर्माण और सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देने की दिशा में टाटा स्टील ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। कंपनी ने स्टील निर्माण के दौरान निकलने वाले उप-उत्पाद एलडी (लिंज़-डोनाविट्ज़) स्लैग से तैयार एम-सैंड (M-Sand) का उपयोग कर ग्रीन कंक्रीट विकसित किया है। इस तकनीक से औद्योगिक अपशिष्ट का बेहतर उपयोग होने के साथ निर्माण कार्यों में कार्बन उत्सर्जन भी कम होगा।
टाटा स्टील के इंडस्ट्रियल बाय-प्रोडक्ट्स मैनेजमेंट डिवीजन (आईबीएमडी) ने एलडी स्लैग से मूल्यवर्धित एम-सैंड तैयार किया है। इसके बाद टाटा स्टील और टाटा स्टील यूआईएसएल की संयुक्त टीम ने इस एम-सैंड की कंक्रीट निर्माण में उपयोगिता का परीक्षण किया। भारतीय मानकों आईएस-10262 और आईएस-456 के अनुरूप एम-15, एम-20 और एम-25 ग्रेड के लिए सफलतापूर्वक कंक्रीट मिक्स डिजाइन तैयार किए गए, जो सभी तकनीकी मानकों पर खरे उतरे।
कंपनी के अनुसार, इस ग्रीन कंक्रीट के प्रत्येक घन मीटर में करीब एक टन एलडी स्लैग आधारित एम-सैंड का उपयोग किया जाता है। इससे प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भरता कम होगी और औद्योगिक उप-उत्पादों का उत्पादक उपयोग सुनिश्चित होगा।
परीक्षणों में इस कंक्रीट ने बेहतर कोहेसिवनेस, पंपेबिलिटी और दो घंटे तक कार्यशीलता (वर्केबिलिटी) बनाए रखने जैसी विशेषताएं प्रदर्शित कीं। प्रयोगशाला परीक्षणों के साथ-साथ साइट पर किए गए परीक्षणों में भी इसके परिणाम संतोषजनक रहे, जिससे व्यावहारिक निर्माण कार्यों में इसके उपयोग का रास्ता साफ हुआ है।
कंपनी का कहना है कि यह नवाचार निर्माण क्षेत्र में संसाधनों के बेहतर उपयोग, पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है तथा औद्योगिक उप-उत्पादों के प्रभावी उपयोग का नया उदाहरण भी प्रस्तुत करता है।
