टाटा वर्कर्स यूनियन के कमेटी सदस्य गुलाब चंद्र यादव व संजय सिंह का कहना है कि टाटा स्टील का लगातार विस्तारीकरण हो रहा, नए-नए लोकेशन जुड़ रहे, दूसरी कंपनियों का अधिग्रहण किया जा रहा है. स्टील की कीमत में बढ़ोतरी हो रही फिर भी 17 वर्षोंे के बाद एनएस ग्रेड के कर्मचारियों का डीए तीन रुपये पर अटका हुआ क्या हैं। टाटा स्टील में लंबित ग्रेड रिवीजन को लेकर कर्मचारियों के बीच असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है. टाटा स्टील के कमेटी सदस्यों ने पूर्व के वेज समझौतों का हवाला देते हुए आरोप लगाया है कि इस बार डीए फ्रीज (महंगाई भत्ता स्थिर रखने) के कारण पुराने कर्मचारियों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। कर्मचारियों के अनुसार 01 जनवरी 2012 से लागू वेज समझौते में 100 प्रतिशत बेसिक, 56.7 प्रतिशत डीए और 18.25 प्रतिशत एमजीबी को मिलाकर कुल सैलरी फैक्टर 185.29 प्रतिशत यानी 1.8529 गुना था, जो सभी ओल्ड सीरीज कर्मचारियों के लिए समान रूप से लागू हुआ था. वहीं 01 जनवरी 2018 से लागू समझौते में यह घटकर 1.63 तक पहुंच गया, जिसमें 100 प्रतिशत बेसिक, 44.8 प्रतिशत डीए और 12.75 प्रतिशत एमजीबी शामिल था।
कर्मचारियों का कहना है कि इस बार यदि 11 प्रतिशत एमजीबी भी मिलता है, तब भी डीए फ्रीज होने के कारण सैलरी फैक्टर घटकर करीब 1.59 रह जाएगा और भविष्य में यह 1.30 तक पहुंच सकता है। उनका आरोप है कि इससे पुराने कर्मचारियों को एक ग्रेड रिवीजन पीछे धकेलने जैसी स्थिति बन जाएगी. न्यू सीरीज कर्मचारियों ने भी अपनी नाराजगी जाहिर की है. उनका कहना है कि वर्ष 2018 के समझौते में एमजीबी को पे-स्केल में नहीं जोडऩे, डीए शून्य समाप्त करने और डीए प्वाइंट वैल्यू नहीं बढ़ाए जाने के कारण उन्हें लगातार नुकसान उठाना पड़ रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि कंपनी का आकार, राजस्व और स्टील की कीमतें लगातार बढ़ी हैं, लेकिन कर्मचारियों का डीए पिछले 17 वर्षों से मात्र 3 रुपये प्रति प्वाइंट पर स्थिर है. उन्होंने वित्तीय प्रदर्शन का हवाला देते हुए कहा कि वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी ने लगभग 10,886 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया है।
वहीं ऑल इंडिया एवरेज कंज्यूमर इंडेक्स, जो कभी 126 था, अब बढक़र 404 तक पहुंच चुका है. इसके बावजूद महंगाई भत्ता और शिक्षा बोनस में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई है. कर्मचारियों ने यह भी कहा कि वर्तमान में शिक्षा बोनस की राशि बेहद कम है, जबकि स्कूलों की फीस तेजी से बढ़ रही है. उनका कहना है कि बढ़ती महंगाई के कारण कर्मचारियों को रोजमर्रा के खर्चों के लिए भी कर्ज लेना पड़ रहा है। कर्मचारियों ने यूनियन नेतृत्व और प्रबंधन से मांग की है कि महंगाई भत्ता को मूल वेतन के प्रतिशत के रूप में या कम से कम 9 रुपये प्रति अंक के हिसाब से लागू किया जाए, ताकि कर्मचारी बढ़ती महंगाई के बीच अपने परिवार का खर्च सम्मानजनक तरीके से चला सकें।
