गंगा में बढ़ते प्रदूषण और मानवीय दबाव के बीच भागलपुर से जलीय जीवों के संरक्षण को लेकर अच्छी खबर सामने आई है। राष्ट्रीय जलीय जीव और विलुप्तप्राय गांगेय डॉल्फिन यानी सोंस की संख्या में पिछले 27 वर्षों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। सर्वेक्षण के मुताबिक, 1998 में सुल्तानगंज से मनिहारी के बीच गंगा में करीब 95 डॉल्फिन थीं, जिनकी संख्या अब बढ़कर लगभग 215 हो गई है। यानी इस अवधि में करीब 120 डॉल्फिन बढ़ी हैं।
कहलगांव से मनिहारी तक गंगा की अलग-अलग धाराओं और घाटों में डॉल्फिन की मौजूदगी लगातार दर्ज की जा रही है। भागलपुर का विक्रमशिला गांगेय डॉल्फिन अभयारण्य, जो सुल्तानगंज से कहलगांव तक फैला है, इनके संरक्षण और प्राकृतिक आवास का प्रमुख केंद्र है।
विशेषज्ञों का मानना है कि नमामि गंगे परियोजना, अभयारण्य क्षेत्र में वन एवं पर्यावरण विभाग की नियमित निगरानी, शिकार पर नियंत्रण और स्थानीय मल्लाहों व ग्रामीणों में बढ़ी जागरूकता का डॉल्फिन की संख्या पर सकारात्मक असर पड़ा है।
हालांकि, डॉल्फिन की बढ़ती संख्या के बीच गंगा के पानी की गुणवत्ता अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। हालिया तकनीकी रिपोर्टों में कहलगांव से मनिहारी के बीच नदी के पानी में बीओडी यानी बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड बढ़ने की बात सामने आई है। बीओडी बढ़ने पर पानी में मौजूद जैविक अपशिष्ट को तोड़ने वाले सूक्ष्मजीव अधिक ऑक्सीजन का इस्तेमाल करते हैं, जिससे जलीय जीवों के लिए जरूरी घुलित ऑक्सीजन प्रभावित हो सकती है।
पर्यावरणविदों के अनुसार, गांगेय डॉल्फिन गंगा की सेहत का अहम जैव-संकेतक है। नदी में इनकी बढ़ती संख्या सकारात्मक संकेत जरूर है, लेकिन इसे स्थायी उपलब्धि बनाने के लिए प्रदूषण पर नियंत्रण जरूरी है।
शहरी सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट, प्लास्टिक कचरे और खेतों से बहकर आने वाले रासायनिक पदार्थों को नदी में पहुंचने से रोकना होगा। साथ ही सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट को पूरी क्षमता और प्रभावी तरीके से संचालित करना जरूरी है, तभी गंगा की जलीय जैव विविधता को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकेगा।
