रतन टाटा के निधन के बाद टाटा ग्रुप अपने इतिहास के सबसे बड़े आंतरिक बदलाव और कॉर्पोरेट मंथन के दौर से गुजर रहा है। मुंबई के बॉम्बे हाउस से २६ मई २०२६ को जारी इस रिपोर्ट के अनुसार, टाटा संस की आज होने वाली विशेष बोर्ड बैठक अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पिछले १b महीनों से जारी आंतरिक तनाव, बैठकों के बार-बार टलने और ट्रस्टियों के बीच उपजे गंभीर मतभेदों के बाद आयोजित की जा रही है। रतन टाटा के बाद उनके भाई नोएल टाटा ने टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष के रूप में कमान संभाली है, जिसकी टाटा संस में लगभग ६६ प्रतिशत की सबसे बड़ी हिस्सेदारी है। इस बदलाव के बाद टाटा संस के बोर्ड प्रतिनिधित्व और सूचनाओं की पारदर्शिता को लेकर ट्रस्ट के भीतर गहरे मतभेद उभर आए हैं। विशेष रूप से पूर्व चेयरमैन के करीबी सहयोगी मेहली मिस्त्री के कार्यकाल का नवीनीकरण न होना और बोर्ड में नामांकित निदेशकों की भूमिका पर हुए विवाद ने इस आंतरिक विभाजन को पूरी तरह सार्वजनिक कर दिया है, जिससे निर्णय लेने की पारंपरिक आम सहमति वाली व्यवस्था प्रभावित हुई है।
इस विवाद की गहराई केवल व्यक्तिगत संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके केंद्र में समूह के बड़े नीतिगत और वित्तीय निर्णय शामिल हैं। पिछले वित्तीय वर्ष २०२५ में टाटा ग्रुप की गैर-सूचीबद्ध यानी अनलिस्टेड कंपनियों को कुल १०,९०५ करोड़ रुपये का भारी नुकसान हुआ था, जिसके और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। इसी साल फरवरी में टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन के तीसरे कार्यकाल की मंजूरी के प्रस्ताव को भी स्थगित कर दिया गया था क्योंकि नोएल टाटा ने एयर इंडिया के घाटे, भारी कर्ज और सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स व डिजिटल जैसे नए क्षेत्रों में किए जा रहे बड़े पूंजी निवेश को लेकर चिंता व्यक्त की थी। इसी वजह से आज की इस विशेष बैठक की शुरुआत में चेयरमैन एन चंद्रशेखरन ने इन नए व्यवसायों के प्रदर्शन, उनके दीर्घकालिक औचित्य और भविष्य की वित्तीय योजनाओं पर एक विस्तृत प्रस्तुति दी है ताकि टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष नोएल टाटा की चिंताओं का समाधान किया जा सके। इसके अतिरिक्त, टाटा संस को गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी के नियमों के तहत शेयर बाजार में सूचीबद्ध कराने यानी आईपीओ लाने की विनियामक बाध्यताओं और कॉर्पोरेट गवर्नेंस के ढांचे को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच गहन मंथन चल रहा है।
