हर साल सर्दियों के आगमन और मकर संक्रांति के त्योहार के साथ ही बिहार के गया जिले से कुशल कारीगरों की टोलियाँ कोलकाता के विभिन्न कोनों में अपनी अस्थायी दुकानें सजा लेती हैं। ये कारीगर पीढ़ियों पुरानी कला को जीवित रखते हुए हाथ से कूटकर पारंपरिक ‘तिलकुट’ तैयार करते हैं, जो शहर के लोगों के लिए केवल एक मिठाई नहीं बल्कि बचपन की यादों का हिस्सा है। तिल और गुड़ या चीनी के सही मिश्रण को लकड़ी के हथौड़ों से कूटने की विशिष्ट तकनीक ही इसे बाजार में मिलने वाले मशीनी उत्पादों से अलग और स्वादिष्ट बनाती है।
कोलकाता के बड़ाबाजार और भवानीपुर जैसे क्षेत्रों में इन दिनों सुबह से ही कूटने की गूंज सुनाई देने लगती है, जहाँ ३०० से लेकर ६०० रुपये प्रति किलो तक तिलकुट बेचा जा रहा है। स्थानीय ग्राहकों का मानना है कि इन कारीगरों के हाथों का बना ताजा और कुरकुरा तिलकुट आधुनिक मिठाइयों के दौर में भी अपनी सांस्कृतिक जड़ें मजबूती से थामे हुए है। हालांकि बढ़ती लागत और कठिन परिश्रम के कारण नई पीढ़ी इस कला से दूर हो रही है, फिर भी ये कारीगर हर साल सर्दियों के ३ महीनों के लिए कोलकाता आकर संक्रांति के उत्सव में पारंपरिक स्वाद का तड़का लगाते हैं।
