जमशेदपुर में पहली बार आए पूर्व अंतर्राष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी व हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के पु त्र अशोक कुमार ध्यानचंद ने कहा कि जीत की भावना ही खेल की आत्मा होती. उन्होंने कहा कि उम्र व खेल कोई भी हो, प्रतिस्पर्धा की भावना हमेशा जीवित रहती है। गुरुवार को कीनन स्टेडियम में आयोजिक पंकज मेमारियल ट्रॉफी के समापन समारोह में भाग लेने आए अशोक कुमार ध्यानचंद ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि खेल केवल जीत-हार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह खिलाडिय़ों और दर्शकों के बीच भावनात्मक जुड़ाव का माध्यम है। एक खेल के महान खिलाड़ी की ओर से दूसरे खेल के खिलाड़ी की सराहना ही खेल की असली सुंदरता है। उन्होंने खेलों के महत्व, भारतीय हॉकी के स्वर्णिम इतिहास, वर्तमान पुनरुत्थान और खिलाडिय़ों के लिए जुनून, त्याग व आर्थिक सुरक्षा के संतुलन पर अपने विचार साझा किए।
उन्होंने भारतीय हॉकी के गौरवशाली इतिहास को याद करते हुए अशोक ध्यानचंद ने इसे दो हिस्सों में बांटा। उन्होंने कहा, एक ध्यानचंद युग था, जिसे हम स्वर्णिम युग कहते हैं, और दूसरा आज की दौर है. उन्होंने भारत की ओलम्पिक उपलब्धियों के बारे में कहा कि भारत ने हॉकी में आठ स्वर्ण, एक रजत और चार कांस्य पदक जीते हैं. इस तरह से 13 ओलंपिक पदक किसी भी अन्य देश के लिए असंभव हैं. उन्होंने कहा कि टाटा हॉकी अकादमी बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। एस्ट्रोटर्फ वजमीनी हॉकी की चुनौती अशोक ध्यानचंद ने कहा कि प्राकृतिक मैदानों से एस्ट्रोटर्फ की ओर बदलाव भारतीय हॉकी की बड़ी कमजोरी बना है। पहले हॉकी हर जगह खेली जाती थी, जैसे आज क्रिकेट खेली जाती है. अब स्कूल-कॉलेजों में टर्फ की कमी सबसे बड़ी समस्या है।
झारखंड हॉकी का उज्ज्वल भविष्य झारखंड हॉकी के बारे में कहा कि अशोक ध्यानचंद ने कहा कि झारखंड की हॉकी बहुत अच्छा कर रही है। यहां से कई खिलाड़ी देश का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. उन्होंने दो लगातार ओलंपिक कांस्य पदकों को भारतीय हॉकी की मजबूती बताया. उन्होंने कहा कि त्याग और समर्पण के बिना कुछ हासिल नहीं होता. जब यह भावना मजबूत होगी, तब भारत फिर स्वर्ण पदक को जीत पाने में कामयाब होगा।
