February 11, 2026
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फिल्म द बंगाल फाइल्स विवादों में घिर गई है। आरोप है कि इस फिल्म में आज़ादी के दौर के चर्चित बंगाली चरित्र गोपाल मुखोपाध्याय उफऱ् ‘गोपाल पाठा’ को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है। फिल्म के ट्रेलर में उन्हें ‘एक था कसाई गोपाल पाठाÓ कहकर दर्शाया गया, जिसे लेकर परिवार ने कड़ा एतराज़ जताया है। 
गोपाल पाठा के नाती शांतनु मुखोपाध्याय ने फिल्म के निर्देशक के खिलाफ बउजार थाने में एफआईआर दर्ज कराई है। साथ ही उन्होंने लीगल नोटिस भेजकर निर्देशक से सार्वजनिक माफ़ी मांगने की मांग की है। शांतनु मुखोपाध्याय का कहना है कि हमारे दादू कसाई नहीं थे, उन्हें फिल्म में गलत तरीके से दिखाया जा रहा है। उनकी छवि को बिगाडऩे का यह दुस्साहस बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। दादू अनुषीलन समिति से जुड़े थे, पहलवान थे, और मांस की दुकान भी चलाते थे। हां, नाम ‘पाठाÓ पड़ा लेकिन वे कभी भी खलनायक नहीं थे। वे सिंह-हृदय इंसान थे, जिन्होंने 1946 में मुस्लिम लीग के दंगाइयों का मुकाबला करके हिंदू-मुसलमान दोनों समुदायों के निर्दोष लोगों को बचाया था। परिवार का कहना है कि गोपाल पाठा का नाम उनकी काया और पेशे के मेल से पड़ा था। 
दरअसल, गोपाल पहलवानी करते थे और दो बकरियों की दुकान भी चलाते थे। बंगालियों के बीच उनका नाम पाठा प्रचलित हुआ। लेकिन वह पहचान किसी भी तरह उन्हें कसाई या विलेन नहीं बनाती। गोपाल पाठा का नाम खासतौर पर 1946 के दंगों में सामने आया था। 16 अगस्त को मुस्लिम लीग और तात्कालिक कम्युनिस्ट नेताओं की सभा के बाद कलकत्ता में हिंसा भड़क उठी थी। हथियारबंद लीग वॉलंटियर्स ने लूटपाट और हत्याएं शुरू कर दीं। ऐसे हालात में गोपाल पाठा ने अपने अनुयायियों को संगठित कर हथियार उठाए और दंगाइयों का मुकाबला किया। परिवार के मुताबिक, उन्होंने साफ़ हिदायत दी थी कि यदि दंगाई किसी एक को मारते हैं तो हम दस को मारेंगे, लेकिन किसी मासूम महिला, बच्चे या बुज़ुर्ग मुस्लिम को हाथ तक नहीं लगाया जाएगा। उनकी इस भूमिका को परिवार अब भी बंगाल के गौरवपूर्ण इतिहास के हिस्से के रूप में याद करता है। संयोग से, 16 अगस्त 2026 को उस ऐतिहासिक घटना के 80 साल पूरे हो गये हैं। इसी मौके पर फिल्म के ट्रेलर के बहाने गोपाल पाठा की छवि पर उठा यह विवाद चर्चा का विषय बन गया है। परिवार का कहना है कि स्वतंत्रता संग्राम के अंतिम संघर्ष में, जब बंगाल की अस्मिता और भारत के नक्शे को बचाने का सवाल था, तब गोपाल पाठा ने हथियार उठाए। ऐसे वीर चरित्र को कसाई बताना न सिफऱ् ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ है बल्कि बंगाल की अस्मिता को ठेस पहुंचाने जैसा है। 

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