बिहार के सीतामढ़ी के छोटे से कस्बे पुपरी में, जो नेपाल सीमा से महज 30 किलोमीटर दूर है, एक छोटे से लडक़े ने अपना ज्यादातर बचपन एक सीधे-सादे सपने का पीछा करते हुए बिताया. वह लडक़ा था उमेश विक्रम कुमार, जो आज भारत के अग्रणी पैरा-बैडमिंटन खिलाडिय़ों में से एक है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट व विश्व रैंकिंग से बहुत पहले, उसकी यात्रा एक कहीं ज्यादा बुनियादी चीज से शुरू हुई थी, उसकी खेल के मैदान में शामिल होने की चाहत थी. दो वर्ष की उम्र में विक्रम को पोलियो होने का पता चला. बड़े होते हुए, उसे खेलों से किसी भी चीज से ज्यादा प्यार था, फिर भी खेल का मैदान हमेशा उसके लिए स्वागत करने वाली जगह नहीं था. उसे हर दिन ऐसा लगता था कि अगर वह आज अच्छा प्रदर्शन नहीं किया, तो शायद उसे कल खेलने का दूसरा मौका न मिले. उसके लिए वह खामोश दबाव एक शक्तिशाली प्रेरणा बन गया।
पैरा बैडमिंंटन खिलाड़ी उमेश विक्रम के एक पल जिसने सब कुछ बदल दिया. उसे आज भी स्कूली दिन याद है है जब वह पांचवीं कक्षा में था, तो उसके स्कूल ने ऊंची कूद (हाई जंप) प्रतियोगिता के लिए ट्रायल आयोजित किए. विक्रम ने स्कूल का सबसे बेहतरीन ऊंची कूद लगाने वाला खिलाड़ी बनकर सबको चौंका दिया्र उसने अपने कई सीनियर छात्रों को भी पीछे छोड़ दिया. फिर भी उसके शानदार प्रदर्शन के बावजूद, स्कूल के खेल विभाग ने शुरू में उसे टीम में न चुनने का फ़ैसला किया. उस युवा खिलाड़ी के लिए, वह एक बेहद भावुक पल था. लेकिन उस अनुभव ने उसे अपने हक के लिए आवाज उठाना भी सिखाया. हिम्मत जुटाकर, विक्रम ने स्कूल के प्रिंसिपल को इस मामले की जानकारी दी. आखिरकार उस फैसले पर दोबारा विचार किया गया और उसे टीम में शामिल कर लिया गया।
पैरा एथलीटों के लिए बड़ी चुनौती पेशेवर तौर पर खेल को अपनाना अपने साथ कई नई चुनौतियां भी लाया. उस समय, भारत में पैरा-एथलीटों के लिए खास ट्रेनिंग सुविधाओं तक पहुंच बहुत सीमित थी. आज विक्रम बैडमिंटन वल्र्ड फेडरेशन की संचालित अंतरराष्ट्रीय पैरा-बैडमिंटन सर्किट में भारत के जाने-माने खिलाडिय़ों में से एक बन गए हैं, यहां तक कि 2025 में एसएल 3 कैटेगरी में मेंस सिंगल्स व मेंस डबल्स, दोनों में वल्र्ड नंबर 1 का खिताब भी हासिल किया है। टाटा स्टील हाई परफॉर्मेंस सेंटर में ट्रेनिंग लेते हुए, उन्होंने वैज्ञानिक ट्रेनिंग, स्ट्रेंथ कंडीशनिंग और पेशेवर कोचिंग की मदद से अपने प्रदर्शन को लगातार बेहतर बनाया है. विक्रम का लक्ष्य सिर्फ मेडल जीतना नहीं बलिक यह दिखाना है कि पक्का इरादा उन दरवाजों को भी खोल सकता है जो कभी बंद लगते थे. टाटा स्टील के स्पोट्र्स इकोसिस्टम के तहत मिले सहयोग से जो अभी अलग-अलग खेलों के लगभग 200 एथलीटों को आगे बढ़ा रहा है. उन्हें उम्मीद है कि उनकी यह यात्रा और भी ज्यादा युवाओं को खेल के जरिए अपने सपनों को पूरा करने के लिए प्रेरित करेगी।
