February 20, 2026
IMG_3544

गूगल की २०२४ की पर्यावरणीय रिपोर्ट के अनुसार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बढ़ती मांग के कारण कंपनी के डेटा केंद्रों में पानी की खपत में भारी वृद्धि हुई है। वर्ष २०२३ के दौरान, गूगल के इन विशाल सर्वर फार्मों ने लगभग ६.१ अरब गैलन ताजे पानी का उपयोग किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में १७% अधिक है। एआई कार्यों के लिए हजारों प्रोसेसर एक साथ काम करते हैं जिससे अत्यधिक गर्मी उत्पन्न होती है, और मशीनों को ठंडा रखने के लिए ‘इवेपोरेटिव कूलिंग’ तकनीक का उपयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इस्तेमाल किए गए पानी का लगभग ८०% हिस्सा भाप बनकर वायुमंडल में उड़ जाता है, जिसे पुनर्चक्रित करना असंभव है, जिससे स्थानीय जल चक्र को भारी नुकसान पहुँचता है।

भारत जैसे जल-तनाव वाले देशों के लिए यह स्थिति और भी चिंताजनक है, जहाँ डेटा केंद्रों का निर्माण तेजी से बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि २०३० तक डेटा केंद्रों द्वारा पानी की खपत दोगुनी से अधिक होकर ३५८ अरब लीटर तक पहुँच सकती है। इसके अलावा, एआई को चलाने के लिए आवश्यक बिजली उत्पादन में भी भारी मात्रा में पानी खर्च होता है, जो अक्सर कोयला या परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से आती है। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि यदि संसाधनों के प्रबंधन और कूलिंग तकनीकों में सुधार नहीं किया गया, तो एआई का यह डिजिटल विस्तार भविष्य में गंभीर पर्यावरणीय संकट और पानी की किल्लत का कारण बन सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *